मैंने लगभग दो सालो से ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा । कभी समय नही तो कभी लैपटॉप नही । विचार आये तो कभी पन्नो पर उतारा तो कभी यो ही हवा हो गए । इतने दिनों बाद जब अपना ब्लॉग खोल रही थी तो खुल भी
नही रहा था ,मेरे ब्लॉग की जगह web 2 rank खुल रहा था ,ऐसा क्यों हो रहा है ?
खैर ........मैंने एक हाइकू लिखने की कोशिश की है ...सही है या नहीं आप बताये ।
"भावनाओ का ज्वार
शब्दों का उफान
बनी एक कविता "
"मुखरित मौन
सुरभित नयन
नेह की भाषा "
Saturday, March 17, 2012
Sunday, February 14, 2010
प्रेम
आज प्रेम दिवस है यानि वलेंताईं डे । प्रेम यो तो किसी दिवस का मोहताज नहीं पर शायद ये दिवस भूली हुयी चीजों को याद दिलाने के लिए आते हैं । आज इस अवसर पर मैं हिंदी साहित्य के दो प्रमुख कवि श्री केदार नाथ अग्रवाल एवं श्री दिनकर जी की कविता आप तक प्रेषित कर रहीं हूँ ।
"इतना प्रिय है प्यार हमारा
जितना प्रिय है
गिरे मनुज को देना प्राण सहारा
इसी प्यार से
हमने तुमने
पाया अपना कूल किनारा "
"जो लोग कमर कस कर
प्रेम की खोज में निकलते हैं
जान लो की वे पूरे प्रेम हीनं हैं
लेकिन ,जो स्वयं प्रेमी हैं
वे प्रेम हर जगह पाते हैं
प्रेम की खोज में कहीं नहीं जाते हैं "
"इतना प्रिय है प्यार हमारा
जितना प्रिय है
गिरे मनुज को देना प्राण सहारा
इसी प्यार से
हमने तुमने
पाया अपना कूल किनारा "
"जो लोग कमर कस कर
प्रेम की खोज में निकलते हैं
जान लो की वे पूरे प्रेम हीनं हैं
लेकिन ,जो स्वयं प्रेमी हैं
वे प्रेम हर जगह पाते हैं
प्रेम की खोज में कहीं नहीं जाते हैं "
Wednesday, November 18, 2009
सवालों के हल
छूना चाहती हूँ आकाश
पर धरती से नही
टूटना चाहती
नापना चाहती हूँ ऊंचाई
पर आधार नहीं
खोना चाहती
उड़ना चाहती हूँ
पर बिखरना नही चाहती
होना चाहती हूँ मुक्त
पर बंधन नही तोडना चाहती
होना चाहती हूँ व्यक्त
पर परिधि नहीं लांघना चाहती
.......
देखती हूँ मेरा न चाहना
मेरे चाहने से अधिक प्रबल है
और फिर
मेरा न चाहना भी तो
मेरा चाहना ही है
इसलिए शायद
मेरे सवालों का
मेरे पास ही हल है
पर धरती से नही
टूटना चाहती
नापना चाहती हूँ ऊंचाई
पर आधार नहीं
खोना चाहती
उड़ना चाहती हूँ
पर बिखरना नही चाहती
होना चाहती हूँ मुक्त
पर बंधन नही तोडना चाहती
होना चाहती हूँ व्यक्त
पर परिधि नहीं लांघना चाहती
.......
देखती हूँ मेरा न चाहना
मेरे चाहने से अधिक प्रबल है
और फिर
मेरा न चाहना भी तो
मेरा चाहना ही है
इसलिए शायद
मेरे सवालों का
मेरे पास ही हल है
Sunday, August 30, 2009
एक पल ....
एक पल को लगा
घर जैसे छूट गया
जहाँ मैं बारिश की बूँद सी
थिरकती थी
पूरे आँगन में
बिखरती थी
बादलो की थी छाँव
बरसने को थी धरती
और पूरा आसमान
भिगोने को हर एक सामान
अब सब जैसे कुछ
भूल गया
घर छूट गया ....
अब घटा बन
उमड़ती घुमड़ती हूँ
बरसने को तरसती हूँ
मन जैसे कुछ टूट गया
घर छूट गया !
घर जैसे छूट गया
जहाँ मैं बारिश की बूँद सी
थिरकती थी
पूरे आँगन में
बिखरती थी
बादलो की थी छाँव
बरसने को थी धरती
और पूरा आसमान
भिगोने को हर एक सामान
अब सब जैसे कुछ
भूल गया
घर छूट गया ....
अब घटा बन
उमड़ती घुमड़ती हूँ
बरसने को तरसती हूँ
मन जैसे कुछ टूट गया
घर छूट गया !
Tuesday, April 21, 2009
कुछ बातें और एक कविता
बहुत दिनों बाद आपके समक्ष हूँ । कारण साधारण ही था (लैपटॉप की तकनिकी खराबी) पर इसने मेरी अभिव्यक्ति को बाधित ज़रूर किया । आप सब याद आते रहे क्योंकि मन तो आप सब से जुड़ ही गया है भले तकनिकी तार टूटा रहा हो ....इधर एक कविता इसी उहा पोह में जन्मी जो आप तक प्रेषित है।
तुम पढो
तो मैं लिखूं
तुम कहो
तो मैं रचूं
सच !
तुम्ही से है
मेरा अस्तित्व
तुम्ही से बना
मेरा व्यक्तित्व
तुम हो मेरी प्रेरणा
तुम हो मेरी चेतना
तुम हो मेरी श्वांस
मेरी हर पीडा का हास
तुम हो मेरे भीतर
या बाहर कहीं
जुड़ी हूँ तुमसे
मैं वहीँ
सच !
तुम ही हो
मै नहीं मै नहीं ........
तुम पढो
तो मैं लिखूं
तुम कहो
तो मैं रचूं
सच !
तुम्ही से है
मेरा अस्तित्व
तुम्ही से बना
मेरा व्यक्तित्व
तुम हो मेरी प्रेरणा
तुम हो मेरी चेतना
तुम हो मेरी श्वांस
मेरी हर पीडा का हास
तुम हो मेरे भीतर
या बाहर कहीं
जुड़ी हूँ तुमसे
मैं वहीँ
सच !
तुम ही हो
मै नहीं मै नहीं ........
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